Monday, June 8, 2009

मूलांक से जानें बच्चे का स्वभाव

बच्चे का मूल स्वभाव जानकर ही शिक्षा दें

अंक ज्योतिष में मूलांक जन्म तारीख के अनुसार 1 से 9 माने जाते हैं। (इसकी चर्चा पिछले लेख में की जा चुकी है।)

प्रत्येक अंक व्यक्ति का मूल स्वभाव दिखाता है। बच्चे का मूल स्वभाव जानकर ही माता-पिता उसे सही तालीम दे सकते हैं। आइए, जानें कैसा है आपके बच्चे का स्वभाव।

मूलांक 1 (1, 10 19, 28) : ये बच्चे क्रोधी, जिद्‍दी व अहंकारी होते हैं। अच्छे प्रशासनिक अधिकारी बनते हैं। ये तर्क के बच्चे हैं अत: डाँट-डपट नहीं सहेंगे। इन्हें तर्क से नहीं, प्यार से समझाएँ।

* मूलांक 2 (2, 11, 20, 29) : ये शांत, समझदार, भावुक व होशियार होते हैं। माता-पिता की सेवा करते हैं। जरा सा तेज बोलना इन्हें ठेस पहुँचाता है। इनसे शांति व समझदारी से बात करें।

* मूलांक 3 (3, 12, 21,30 ) : ये समझदार, ज्ञानी व घमंडी होते हैं। अच्‍छे सलाहकार बनते हैं। इन्हें समझाने के लिए पर्याप्त कारण व ज्ञान होना जरूरी है।

* मूलांक 4 (4, 13, 22) : बेपरवाह, खिलंदड़े व कारस्तानी होते हैं। रिस्क लेना इनका स्वभाव होता है। इन्हें अनुशासन में रखना जरूरी है। ये व्यसनाधीन हो सकते हैं।

* मूलांक 5 (5, 14, 23) : बुद्धिमान, शांत, आशावादी होते हैं। रिसर्च के कामों में रूचि लेते हैं। इनके साथ धैर्य से व शांति से बातचीत करें।

* मूलांक 6 (6, 15, 24) : हँसमुख, शौकीन मिजाज व कलाप्रेमी होते हैं। 'खाओ पियो ‍मस्त रहो' पर जीते हैं। इन्हें सही संस्कार व सही दिशा-निर्देश जरूरी है।

* मूलांक 7 (7, 16, 25) : भावुक, निराशावादी, तनिक स्वार्थी मगर तीव्र बुद्धि के होते हैं। व्यसनाधीन जल्दी होते हैं। कलाकार हो सकते हैं। इन्हें कड़े अनुशासन व सही मार्गदर्शन की जरूरत होती है।

* मूलांक 8 (8, 17, 26) : तनिक स्वार्थी, भावुक, अति व्यावहारिक, मेहनती व व्यापार बुद्धि वाले होते हैं। जीवन में देर से गति आती है। इन्हें सतत सहयोग व अच्छे साथियों की जरूरत होती है।

* मूलांक 9 (9, 18, 27) : ऊर्जावान, शैतान व तीव्र बुद्धि के विद्रोही होते हैं। माता-पिता से अधिक बनती नहीं है। प्रशासन में कुशल होते हैं। इनकी ऊर्जा को सही दिशा देना व इन्हें समझना जरूरी होता है।

Tuesday, May 26, 2009

राहु बनाता है चतुर राजनेता

राहु बनाता है चतुर राजनेता
राजनीति एक ऐसा क्षेत्र बनता जा रहा है, जहाँ कम परिश्रम में भरपूर पैसा व प्रसिद्ध‍ि दोनों ही प्राप्त होते हैं। ढेरों सुख-सुविधाएँ अलग से मिलती ही है। और मजा ये कि इसमें प्रवेश के लिए किसी विशेष शैक्षणिक योग्यता की भी जरूरत नहीं होती।
राजनीति में जाने के लिए भी कुंडली में कुछ विशेष ग्रहों का प्रबल होना जरूरी है। राहु को राजनीति का ग्रह माना जाता है। यदि इसका दशम भाव से संबंध हो या यह स्वयं दशम में हो तो व्यक्ति धूर्त राजनीति करता है। अनेक तिकड़मों और विवादों में फँसकर भी अपना वर्चस्व कायम रखता है। राहु यदि उच्च का होकर लग्न से संबंध रखता हो तब भी व्यक्ति चालाक होता है।
राजनीति के लिए दूसरा ग्रह है गुरु- गुरु यदि उच्च का होकर दशम से संबंध करें, या दशम को देखें तो व्यक्ति बुद्धि के बल पर अपना स्थान बनाता है। ये व्यक्ति जन साधारण के मन में अपना स्थान बनाते हैं। चालाकी की नहीं वरन् तर्कशील, सत्य प्रधान राजनीति करते हैं।
बुध के प्रबल होने पर दशम से संबंध रखने पर व्यक्ति अच्छा वक्ता होता है। बुध गुरु दोनों प्रबल होने पर वाणी में ओज व विद्वत्ता का समन्वय होता है। ऐसे व्यक्तियों की भाषण कला लोकप्रिय होती है। उसी के बल पर वे जनमानस में अपना स्थान बनाते हैं।
हमेशा की तरह राजनीति में भी चमकने के लिए सूर्य का प्रबल होना जरूरी है। सूर्य लग्न, चतुर्थ, नवम या दशम में हो तो व्यक्ति उच्च पद को आसीन होता है, राजनीतिक पटल पर उभरता है और लोगों के मन पर राज करता है।
यदि कुंडली में कारक ग्रह शनि हो (वृषभ, तुला लग्न में) तो शनि का मजबूत होना जरूरी है। शनि स्थायित्व, स्थिरता देता है। शनि प्रधान ऐसे व्यक्तियों को धर्म व न्याय का साथ देना चाहिए, सत्य की राजनीति करना चाहिए अन्यथा शनि का कोप उन्हें धरातल पर ला फेंक सकता है।
इस प्रकार कुंडली का निरीक्षण कर संबंधित ग्रहों को मजबूत किया जा सकता है और राजनीति में परचम लहराए जा सकते हैं।

Monday, May 25, 2009

क्या बताते हैं कुंडली के 12 भाव

क्या बताते हैं कुंडली के 12 भाव
ज्योतिष में मान्य बारह राशियों के आधार पर जन्मकुंडली में बारह भावों की रचना की गई है। प्रत्येक भाव में मनुष्य जीवन की विविध अव्यवस्थाओं, विविध घटनाओं को दर्शाता है। आइए इनके बारे में विस्तार से जानें।
1. प्रथम भाव : यह लग्न भी कहलाता है। इस स्थान से व्यक्ति की शरीर यष्टि, वात-पित्त-कफ प्रकृति, त्वचा का रंग, यश-अपयश, पूर्वज, सुख-दुख, आत्मविश्वास, अहंकार, मानसिकता आदि को जाना जाता है।
2. द्वितीय भाव : इसे धन भाव भी कहते हैं। इससे व्यक्ति की आर्थिक स्थिति, परिवार का सुख, घर की स्थिति, दाईं आँख, वाणी, जीभ, खाना-पीना, प्रारंभिक शिक्षा, संपत्ति आदि के बारे में जाना जाता है।
3. तृतीय भाव : इसे पराक्रम का सहज भाव भी कहते हैं। इससे जातक के बल, छोटे भाई-बहन, नौकर-चाकर, पराक्रम, धैर्य, कंठ-फेफड़े, श्रवण स्थान, कंधे-हाथ आदि का विचार किया जाता है।
4. चतुर्थ स्थान : इसे मातृ स्थान भी कहते हैं। इससे मातृसुख, गृह सौख्‍य, वाहन सौख्‍य, बाग-बगीचा, जमीन-जायदाद, मित्र छाती पेट के रोग, मानसिक स्थिति आदि का विचार किया जाता है।
5. पंचम भाव : इसे सुत भाव भी कहते हैं। इससे संतति, बच्चों से मिलने वाला सुख, विद्या बुद्धि, उच्च शिक्षा, विनय-देशभक्ति, पाचन शक्ति, कला, रहस्य शास्त्रों की रुचि, अचानक धन-लाभ, प्रेम संबंधों में यश, नौकरी परिवर्तन आदि का विचार किया जाता है।
6. छठा भाव : इसे शत्रु या रोग स्थान भी कहते हैं। इससे जातक के श‍त्रु, रोग, भय, तनाव, कलह, मुकदमे, मामा-मौसी का सुख, नौकर-चाकर, जननांगों के रोग आदि का विचार किया जाता है।
7.सातवाँ भाव : विवाह सौख्य, शैय्या सुख, जीवनसाथी का स्वभाव, व्यापार, पार्टनरशिप, दूर के प्रवास योग, कोर्ट कचहरी प्रकरण में यश-अपयश आदि का ज्ञान इस भाव से होता है। इसे विवाह स्थान कहते हैं।
8.आठवाँ भाव : इस भाव को मृत्यु स्थान कहते हैं। इससे आयु निर्धारण, दु:ख, आर्थिक स्थिति, मानसिक क्लेश, जननांगों के विकार, अचानक आने वाले संकटों का पता चलता है।
9.नवाँ भाव : इसे भाग्य स्थान कहते हैं। यह भाव आध्यात्मिक प्रगति, भाग्योदय, बुद्धिमत्ता, गुरु, परदेश गमन, ग्रंथपुस्तक लेखन, तीर्थ यात्रा, भाई की पत्नी, दूसरा विवाह आदि के बारे में बताता है।
10.दसवाँ भाव : इसे कर्म स्थान कहते हैं। इससे पद-प्रतिष्ठा, बॉस, सामाजिक सम्मान, कार्य क्षमता, पितृ सुख, नौकरी व्यवसाय, शासन से लाभ, घुटनों का दर्द, सासू माँ आदि के बारे में पता चलता है।
11.ग्यारहवाँ भाव : इसे लाभ भाव कहते हैं। इससे मित्र, बहू-जँवाई, भेंट-उपहार, लाभ, आय के तरीके, पिंडली के बारे में जाना जाता है।
12.बारहवाँ भाव : इसे व्यय स्थान भी कहते हैं। इससे कर्ज, नुकसान, परदेश गमन, संन्यास, अनैतिक आचरण, व्यसन, गुप्त शत्रु, शैय्या सुख, आत्महत्या, जेल यात्रा, मुकदमेबाजी का विचार किया जाता है।

Monday, May 18, 2009

होटल व्यवसाय में सफलता के योग

होटल व्यवसाय में सफलता के योग
अत्याधुनिक सुसज्जित फाइव स्टार होटल का जिक्र होते ही हमारे जेहन में एक ऐसी जगह की तस्वीर उभरती है जहाँ खाने-पीने से लेकर हर प्रकार की सुविधा एवं ठहरने की उत्तम व्यवस्था होती है। यहाँ ठहरने वालों को उचित आराम और सुविधाएँ मिलें इसके लिए छोटी से छोटी बात का ध्यान रखा जाता है। इसीलिए उच्च होटल व्यवसाय में बहुत अधिक धन की आवश्यकता होती है और यदि इतना धन लगाकर भी सफलता न मिले तो सब किया कराया बेकार हो जाता है। तो आइए जानते हैं कि इस क्षेत्र में सफलता के योग किस प्रकार कुंडली में बैठे ग्रहों से सुनिश्चित होते हैं।
यह व्यवसाय शुक्र, बुध, मंगल से प्रेरित है। व्यवसाय भाव दशम, लग्न, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ भाव व एकादश भाव विशेष महत्व रखते हैं। दशम भाव उच्च व्यवसाय का भाव है तो दशम से सप्तम जनता से संबंधित भाव हैं। व्यापार जनता से संबंधित है अतः इनका संबंध होना भी परम आवश्यक है।
द्वितीय भाव वाणी का है। यदि व्यापारी की वाणी ठीक नहीं होगी तो व्यापार चौपट हो जाएगा। लग्न स्वयं की स्थिति को दर्शाता है व एकादश भाव आय का है तो तृतीय भाव पराक्रम का है। इन सबका इस व्यवसाय में विशेष योगदान रहता है। अब आता है नवम भाव, इन सबके होने के साथ यदि नवम भाव का स्वामी भी मित्र स्वराशि उच्च का हो या उपरोक्त में से किसी भी एक या अनेक भावों के स्वामी के साथ संबंधित हो तो सोने पे सुहागा वाली बात होती है।
होटल व्यवसाय के लिए सबसे उत्तम लग्न वृषभ, तुला, मिथुन तथा सिंह है, क्योंकि वृषभ लग्न स्थिर है वहीं तुला लग्न चर है। मिथुन द्विस्वभाव वाला व सिंह भी स्थिर लग्न है, लेकिन इनके स्वामियों का सबसे बड़ा योगदान इस व्यवसाय में महत्व रखता है। वृषभ लग्न हो व लग्नेश शुक्र उच्च का होकर एकादश भाव में हो व उसे पंचमेश व धनेश बुध की पूर्ण दृष्टि हो तो ऐसा जातक उच्च होटल व्यवसाय में सफल होता है। यदि शनि स्वराशि मकर का हो तो और भी उत्तम सफलता पाने वाला होगा इसी प्रकार तृतीयेश लग्न में हो व चतुर्थ भाव का स्वामी पंचम भाव में या चतुर्थ भाव में हो तो इस व्यवसाय में खूब सफलता मिलती है।
यदि किसी जातक का तुला लग्न हो व लग्नेश चतुर्थ भाव में हो ता व उसे दशमेश चंद्रमा की दृष्टि पड़ती हो या दशमेश के साथ हो तो वह जातक इस व्यवसाय में उत्तम सफलता पाने वाला होगा। किसी जातक का सिंह लग्न हो व दशमेश शुक्र चतुर्थ भाव में मंगल के साथ हो तो वह अनेक होटलों का मालिक होगा। मिथुन लग्र वालों के लिए पंचमेश व द्वादशेश शुक्र दशम में हो व दशमेश उच्च का होकर द्वितीय भाव में हो व तृतीयेश व लग्नेश का संबंध चतुर्थ भाव में हो तो वह जातक उच्च होटल व्यवसाय में सफलता पाने वाला होगा।
शुक्र का संबंध यदि दशम भाव के स्वामी के साथ हो या लग्न के साथ हो या चतुर्थेश के साथ हो तब भी होटल व्यवसाय में उस जातक को सफलता मिलती है। चतुर्थ भाव जनता का है और यदि चतुर्थेश दशम भाव में हो एवं दशमेश लग्न में हो व लग्नेश की दशम भाव पर दृष्टि पड़ती है तो तब भी वह जातक उच्च होटल व्यवसाय में सफलता पाता है।
द्वितीय वाणी भाव का स्वामी लग्नेश में हो तो ऐसा जातक अपनी वाणी के द्वारा सफल होता है। भाग्य भाव का स्वामी यदि चतुर्थ भाव के स्वामी के साथ हो व शुक्र से संबंध हो या युति बनाता हो तब भी वह जातक होटल व्यवसाय में सफल होता है। यदि द्वादश भाव में उच्च का शुक्र हो तो चतुर्थेश का संबंध लग्नेश से हो व पंचमेश लग्न में हो व दशमेश आय भाव में हो तो वह जातक अत्यधिक सफल होकर धनी बनता है।
मोहनसिंग ओबेरॉय की कुंडली
उदाहरण के लिए यहाँ पर मुंबई की एक प्रसिद्ध होटल ओबेरॉय के चेयरमैन मोहनसिंग ओबेरॉय की कुंडली को देखें तो पता चलता है कि इनका जन्म लग्न वृषभ है व लग्नेश शुक्र पर भाग्येश शनि की दृष्टि पड़ रही है, वहीं चतुर्थेश चतुर्थ भाव में है व आयेश गुरु की उच्च दृष्टि तृतीय पराक्रम भाव पर पड़ रही है। भावेश लग्न को देख रहा है वहीं लाभेश लाभ भाव को देख रहा है।
मोहनसिंग ओबेरॉय को अंतरराष्ट्रीय कीर्ति तो प्राप्त हुई साथ ही वे 1968 से 1970 तक राज्यसभा सदस्य भी रहे ओबेरॉय होटल की प्रसिद्धि के बारे में प्रमाण देने की आवश्यकता ही नहीं है। इस प्रकार हम कुंडली के माध्यम से पहले जान लें कि यह व्यवसाय हमारे लिए सफल होगा कि नहीं फिर ही कोई कदम बढ़ाएँ।

शल्य चिकित्सक बनने का योग

शल्य चिकित्सक बनने का योग
एकादश भाव आय का, पंचम भाव संतान, विद्या, मनोरंजन का भाव है। इस एकादश भाव से पंचम भाव पर सूर्य, चंद्र, शुक्र की सप्तम पूर्ण दृष्टि पड़ती है। वहीं मंगल की दशम भाव से अष्टम एकादश भाव से सप्तम व धन, कुटुंब भाव से चतुर्थ दृष्टि पूर्ण पती है। गुरु धर्म, भाग्य भाव नवम से पंचम भाव पर नवम दृष्टि डालता है तो एकादश भाव से सप्तम लग्न से पंचम दृष्टि पूर्ण पती है। शनि की तृतीय दृष्टि तृतीय भाई, पराक्रम भाव से एकादाश भाव से सप्तम व अष्टम भाव से दशम पूर्ण दृष्टि पड़ती है।
यहाँ पर हमारे अनुभव अनुसार राहु-केतु जो छाया ग्रह हैं, उनके बारे में विशेष फल नहीं मिलता न ही इनकी दृष्टि को माना जाता है न ही किसी एकादश भाव पर रहने से पंचम भाव पर कोई असर आता है।
सर्वप्रथम सूर्य को लें यहाँ से यदि पंचम भाव पर सिंह राशि अपनी स्वदृष्टि से देखता है तो भले ही आय में कमी हो, लेकिन विद्या व संतान उत्तम होती है, संतान के बहोने पर लाभ मिलता है। एकादश भाव में कोई ग्रह हो, नीच को छोसभी शुभफल प्राप्त होते हैं। सूर्य की तुला राशि पर दृष्टि संतान व विद्या में कष्टकारी होती है। अतः ऐसे जातकों को सूर्य की आराधना व सूर्य से संबंधित वस्तुओं का दान अपने शरीर से सात या नौ बार उतारकर रविवार को करना चाहिए। इस प्रकार अनिष्ट प्रभाव से बचा जा सकता है। जिन ग्रहों की नीच दृष्टि पड़े, उससे संबंधित दान करें।
चंद्रमा की स्वदृष्टि पंचम भाव पर पड़े तो जातक शांति नीति वाला, ज्ञानी, सद्‍चरित्र, गुणी, मान-सम्मान पाने वाला होता है उसे भूमि में गड़ा धन मिलता है। ऐसा जातक मिलनसार होता है। अशुभ वृश्चिक राशि को देखता हो तो चंद्र की वस्तु दान करना ही श्रेष्ठ रहेगा। मंगल की शत्रु नीच दृष्टि यदि पंचम भाव पर पती हो तो संतान से कष्ट, विद्या में कमी रहती है। यदि मित्र स्वदृष्टि हो तो संतान आदि में उत्तम लाभ रहता है।
यदि मंगल दशम भाव से स्वदृष्टि वृश्चिक राशि को देखता हो तो वह जातक चिकित्सा क्षेत्र में होता है और सर्जन बनता है। ऐसा जातक यदि फौजदारी में रहे व वकालत करे तो भी लाभ पाता है। मंगल की चतुर्थ दृष्टि पंचम भाव पर उच्च, स्व मित्र दृष्टि के रुप में पड़े तो वह विद्या के क्षेत्र में उत्तम लाभ पाता है। वहीं उसकी संतान भी स्वस्थ, उत्तम, धनी होती है।
धन कुटुंब से भी उत्तम लाभ पाता है। मंगल की नीच शत्रु दृष्टि पड़े तो धन, कुटुंब से हानि, विद्या में मन न लगना आदि होता है। बुध की उच्च स्वदृष्टि संतान, विद्या में उत्तम लाभकारी होती है। मित्र दृष्टि हो तो जातक को सभी सुख मिलते हैं। ऐसा जातक चित्रकला, शिल्पकला, लेखक, पत्रकार आदि होता है। व्यापार-व्यवसाय में भी सफल होता है।
गुरु यदि पंचम दृष्टि से देखता हो तो वह जातक ईमानदार, कर्त्तव्यनिष्ठ, आज्ञाकारी होता है। न्यायाधीश, उच्च प्रशासनिक अधिकारी भी हो सकता है। वृषभ का गुरु होकर पंचम भाव को देखता हो तो ऐसा जातक कामातुर होता है। नवम भाव से गुरु पंचम भाव पर दृष्टि स्व, उच्च, मित्र रखता हो तो ऐसा जातक विद्वान, ज्ञानी, संतों का सेवक, धर्म-कर्म में पूर्ण आस्थावान होता है तथा उसकी संतान भाग्यशाली होती है। गुरु की एकादश भाव से पूर्ण दृष्टि पड़ती है तो ऐसा योग संतान में बाधक भी बन जाता है व देर से संतान होती है। शत्रु या नीच दृष्टि पड़ती हो तो उसकी स्त्री बाँझ भी हो सकती है। संतान अधर्मी, कष्टकारी होती है, लेकिन ऐसा जातक धन से सुखी होता है।
शुक्र की एकादश भाव से स्वदृष्टि विद्या, मनोरंजन के क्षेत्र से, इलेक्ट्रॉनिक, व्यापार से, इंजीनियर में सफलता पाता है। मनोविनोदी कन्या संतति अधिक होती है। ऐसे जातकों के अनेक स्त्रियों से संबंध होते हैं। मित्रों से लाभ पाने वाला, खर्चीला भी होता है।
शनि की पंचम भाव पर तृतीय भाव से तृतीय स्व, उच्च दृष्टि, मित्र दृष्टि विद्या में, संतान आदि में तो विलंब से लाभ दिलाती है व जातक संतान से दुःखी रहता है। शनि की एकादश भाव से पूर्ण दृष्टि स्व, मित्र पसे राज्यपक्ष से लाभ पाने वाला, वाहनादि से पूर्ण, उत्तम धन पाने वाला रहता है। शनि की दशम दृष्टि अष्टम भाव से पत्नी से सुखी रखती है वहीं संतान भी आज्ञाकारी होती है, लेकिन शत्रु नीच दृष्टि पड़े तो संतान आदि से कष्ट मिलता है।
उपरोक्त ग्रह स्थिति में किसी भी ग्रह की अशुभ दृष्टि पंचम भाव पर पड़ती हो तो उन ग्रहों से संबंधित दान की वस्तुएँ उसी दिन को अपने शरीर से 9 बार उतारकर उसी रंग के कप में बाँधकर जमीन में गाड़ देने से अशुभ प्रभाव में न्यूनता आ जाती है।

विदेश यात्रा के योग

विदेश यात्रा के योग
विदेश में कितने समय के लिए वास्तव्य होगा, यह जानने के लिए व्यय स्थान स्थित राशि का विचार करना आवश्यक होता है। व्यय स्थान में यदि चर राशि हो तो विदेश में थोड़े समय का ही प्रवास होता है।
विदेश यात्रा के योग के लिए चतुर्थ स्थान का व्यय स्थान जो तृतीय स्थान होता है, उस पर गौर करना पड़ता है। इसके साथ-साथ लंबे प्रवास के लिए नवम स्थान तथा नवमेश का भी विचार करना होता है। परदेस जाना यानी नए माहौल में जाना। इसलिए उसके व्यय स्थान का विचार करना भी आवश्यक होता है। जन्मांग का व्यय स्थान विश्व प्रवास की ओर भी संकेत करता है।
विदेश यात्रा का योग है या नहीं, इसके लिए तृतीय स्थान, नवम स्थान और व्यय स्थान के कार्येश ग्रहों को जानना आवश्यक होता है। ये कार्येश ग्रह यदि एक दूजे के लिए अनुकूल हों, उनमें युति, प्रतियुति या नवदृष्टि योग हो तो विदेश यात्रा का योग होता है। अर्थात उन कार्येश ग्रहों की महादशा, अंतरदशा या विदशा चल रही हो तो जातक का प्रत्यक्ष प्रवास संभव होता है। अन्यथा नहीं।
इसके साथ-साथ लंबे प्रवास के लिए नवम स्थान तथा नवमेश का भी विचार करना होता है। परदेस जाना यानी नए माहौल में जाना।
इसलिए इस बारे में सबसे महत्वपूर्ण स्थान होता है व्यय स्थान। विदेश यात्रा का निश्चित योग कब आएगा, इसलिए उपरोक्त तीनों भावों के कार्येश ग्रहों की महादशा-अंतरदशा-विदशा पर गौर करने पर सही समय का पता किया जा सकता है।
विदेश में कितने समय के लिए वास्तव्य होगा, यह जानने के लिए व्यय स्थान स्थित राशि का विचार करना आवश्यक होता है। व्यय स्थान में यदि चर राशि हो तो विदेश में थोड़े समय का ही प्रवास होता है। व्यय स्थान में अगर स्थिर राशि हो तो कुछ सालों तक विदेश में रहा जा सकता है। यदि द्विस्वभाव राशि हो तो परदेस आना-जाना होता रहता है। इसके साथ-साथ व्यय स्थान से संबंधित कौन-से ग्रह और राशि हैं, इनका विचार करने पर किस देश में जाने का योग बनता है, यह भी जाना जा सकता है।
सर्वसाधारण तौर पर यदि शुक्र का संबंध हो तो अमेरिका जैसे नई विचार प्रणाली वाले देश को जाने का योग बनता है। उसी तरह अगर शनि का संबंध हो तो इंग्लैंड जैसे पुराने विचारों वाले देश को जाना संभव होता है। अगर राहु-केतु के साथ संबंध हो तो अरब देश की ओर संकेत किया जा सकता है।
तृतीय स्थान से नजदीक का प्रवास, नवम स्थान से दूर का प्रवास और व्यय स्थान की सहायता से वहाँ निवास कितने समय के लिए होगा यह जाना जा सकता है।

1. नवम स्थान का स्वामी चर राशि में तथा चर नवमांश में बलवान होना आवश्यक है।
2. नवम तथा व्यय स्थान में अन्योन्य योग होता है।
3. तृतीय स्थान, भाग्य स्थान या व्यय स्थान के ग्रह की दशा चल रही हो।
4. तृतीय स्थान, भाग्य स्थान और व्यय स्थान का स्वामी चाहे कोई भी ग्रह हो वह यदि उपरोक्त स्थानों के स्वामियों के नक्षत्र में हो तो विदेश यात्रा होती है।
यदि तृतीय स्थान का स्वामी भाग्य में, भाग्येश व्यय में और व्ययेश भाग्य में हो, संक्षेप में कहना हो तो तृतियेश, भाग्येश और व्ययेश इनका एक-दूजे के साथ संबंध हो तो विदेश यात्रा निश्चित होती है।

भोजन संबंधी आदतें और ज्योतिष

भोजन संबंधी आदतें और ज्योतिष
ज्योतिष एक पूर्ण विकसित शास्त्र है जिसमें केवल एक कुंडली उपलब्ध होने पर उस मनुष्य के समस्त जीवन का खाका खींचा जा सकता है। यहाँ तक कि उसके खानपान संबंधी आदतें भी कुंडली से बताई जा सकती हैं।
* धन स्थान से भोजन का ज्ञान होता है। यदि इस स्थान का स्वामी शुभ ग्रह हो और शुभ स्थिति में हो तो व्यक्ति कम भोजन करने वाला होता है।
* यदि धनेश पाप ग्रह हो, पाप ग्रहों से संबंध करता हो तो व्यक्ति अधिक खाने वाला (पेटू) होगा। यदि शुभ ग्रह पाप ग्रहों से दृष्ट हो या पाप ग्रह शुभ से (धनेश होकर) तो व्यक्ति औसत भोजन करेगा।
* लग्न का बृहस्पति अतिभोजी बनाता है मगर यदि अग्नि तत्वीय ग्रह (मंगल, सूर्य बृहस्पति) निर्बल हों तो व्यक्ति की पाचन शक्ति गड़बड़ ही रहेगी।
* धनेश शुभ ग्रह हो, उच्च या मूल त्रिकोण में हो या शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो व्यक्ति आराम से भोजन करता है।
* धनेश मेष, कर्क, तुला या मकर राशि में हो या धन स्थान को शुभ ग्रह देखें तो व्यक्ति जल्दी खाने वाला होता है।
* धन स्थान में पाप ग्रह हो, पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो व्यक्ति बहुत धीरे खाता है।
खाने में पसंद आने वाली चीजों की सूचना छठे भाव से मिलती है।
* छठे स्थान में बुध या बृहस्पति हो तो नमकीन वस्तुएँ पसंद आती हैं।
* बृहस्पति बलवान होकर राज्य या धन स्थान में हो तो मीठा खाने का शौकीन होता है।
* शुक्र, मंगल छठे स्थान में हों तो खट्‍टी वस्तुएँ पसंद आती हैं।
* शुक्र-बुध की युति हो या छठे स्थान पर गुरु-शुक्र की दृष्टि हो तो मीठी वस्तुएँ पसंद आती हैं।
* छठे स्थान में सिंह राशि हो तो तामसी भोजन (मांस-अंडे) पसंद आता है। वृषभ राशि हो तो चावल अधिक खाते हैं।
* बुध पाप ग्रहों से युक्त होने पर मीठी वस्तुएँ बिलकुल नहीं भातीं।

वेलेंटाइन डे : प्रेम और ज्योतिष

वेलेंटाइन डे : प्रेम और ज्योतिष
प्रेम एक पवित्र भाव है। मानव मात्र प्रेम के सहारे जीता है और सदैव प्रेम के लिए लालयित रहता है। प्रेम का अर्थ केवल पति-पत्नी या प्रे‍मी-प्रेमिका के प्रेम से नहीं लिया जाना चाहिए। मनुष्य जिस समाज में रहता है, उसके हर रिश्ते से उसे कितना स्नेह- प्रेम मिलेगा, यह बात कुंडली भली-भाँति बता सकती है।
कुंडली का पंचम भाव प्रेम का प्रतिनिधि भाव कहलाता है। इसकी सबल स्थिति प्रेम की प्रचुरता को बताती है। इस भाव का स्वामी ग्रह यदि प्रबल हो तो जिस भाव में स्थित होता है, उसका प्रेम जातक को अवश्य मिलता है।

* पंचमेश लग्नस्थ होने पर जातक को पूर्ण देह सुख व बुद्धि प्राप्त होती है।
* पंचमेश द्वितीयस्थ होने पर धन व परिवार का प्रेम मिलता है।
* तृतीयस्थ पंचमेश छोटे भाई-बहनों से प्रेम दिलाता है।
* पंचमेश चतुर्थ में हो तो माता का, जनता का प्रेम मिलता है।
* पंचमेश पंचम में हो तो पुत्रों से प्रेम मिलता है।
* पंचमेश सप्तम में हो तो जीवनसाथ‍ी से अत्यंत प्रेम रहता है।
* पंचमेश नवम में हो तो भाग्य साथ देता है, ईश्‍वरीय कृपा मिलती है। पिता से प्रेम मिलता है।
* पंचमेश दशमस्थ होकर गुरुजनों, अधिकारियों का प्रेम दिलाता है।
* पंचमेश लाभ में हो तो मित्रों व बड़े भाइयों का प्रेम मिलता है।
पंचमेश की षष्ट, अष्‍ट व व्यय की स्थिति शरीर व प्रेम भरे रिश्तों को नुकसान पहुँचाती है।
पंचम भाव के अतिरिक्त लग्न का स्वामी द्वितीय में जाकर परिवार का, तृतीय में भाई-बहनों का, चतुर्थ में माता व जनता का, पंचम में पुत्र-पुत्री का, सप्तम में पत्नी का, नवम में पिता का व दशम में गुरुजनों का स्नेह दिलाता है।
प्रेम विवाह योग

कुंडली में पंचम भाव का स्वामी प्रबल होकर सप्तम में हो या सप्तमेश पंचम में हो, शुक्र-मंगल युति-प्रतियुति हो, केंद्र या नव पंचम योग हो, लग्नेश पंचम, सप्तम या व्यय में हो, पत्रिका में चंद्र, शुक्र शुभ हो तो प्रेम विवाह अवश्‍य होता है।
यदि सप्तम में स्वराशि का मंगल हो, फिर भी जीवन साथी का भरपूर प्रेम मिलता है। सप्तम व व्यय पर शुभ ग्रहों की दृष्‍टि विवाह सुख बढ़ाती है, प्रेम संबंध प्रबल करती है, वहीं अशुभ ग्रहों की उपस्थिति प्रेम की राह में रोडे अटकाती है।
प्रेम विवाह मुख्यत: शुक्र प्रधान राशियों में देखा जाता है। जैसे वृषभ व तुला ! इसके अतिरिक्त धनु राशि के व्यक्ति रुढि़यों को तोड़ने का स्वभाव होने से प्रेम विवाह करते हैं। इसके अलावा कर्क राशि में यदि चंद्र-शुक्र प्रबल हो तो प्रेम विवाह में रुचि रहती है। पंचम भाव यदि शनि से प्रभावित हो और शनि सप्तम में हो तो प्रेम विवाह अवश्‍य होता है।
* केतु यदि नवम भाव या व्यय में स्थित हो तो मनुष्‍य को आध्यात्मिक प्रेम मिलता है, अलौकिक शक्ति के प्रेम को हासिल करने में उसकी रुचि रहती है।

Thursday, May 14, 2009

ग्रहों के अनुरूप चुनें विषय

चौथे व पाँचवें भाव से जानें विषय
दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करते ही 'कौन-सा विषय चुनें' यह यक्ष प्रश्न बच्चों के सामने आ खड़ा होता है। माता-पिता को अपनी महत्वाकांक्षाओं को परे रखकर एक नजर कुंडली पर भी मार लेनी चाहिए। बच्चे किस विषय में सिद्धहस्त होंगे, यह ग्रह स्थिति स्पष्ट बताती है।
* विषय के चुनाव हेतु कुंडली के चौथे व पाँचवें भाव का प्रमुख रूप से अध्ययन करना चाहिए। साथ ही लग्न यानी व्यक्ति के स्वभाव का ‍भी विवेचन कर लेना चाहिए।

ग्रहानुसार विषय :
* यदि चौथे व पाँचवें भाव पर हो।

1सूर्य का प्रभाव - आर्ट्‍स, विज्ञान

2 मंगल का प्रभाव - जीव विज्ञान

3. चंद्रमा का प्रभाव - ट्रेवलिंग, टूरिज्म,

4. बृहस्पति का प्रभाव - किसी विषय में अध्यापन की डिग्री

5 बुध का प्रभाव - कॉमर्स, कम्प्यूटर

6 शुक्र का प्रभाव- मीडिया, मास कम्युनिकेशन, गायन, वादन

7 शनि का प्रभाव- तकनीकी क्षेत्र, गणित

इन मुख्‍य ग्रहों के अलावा ग्रहों की युति-प्रतियुति का भी अध्ययन करें, तभी किसी निष्कर्ष पर पहुँचें। (जैसे शुक्र और बुध हो तो होम्योपैथी या आयुर्वेद पढ़ाएँ) ताकि चुना गया विषय बच्चे को आगे सफलता दिला सके।

प्रेम विवाह के कुछ मुख्य योग

प्रेम विवाह के कुछ मुख्य योग
1. लग्नेश का पंचक से संबंध हो और जन्मपत्रिका में पंचमेश-सप्तमेश का किसी भी रूप में संबंध हो। शुक्र, मंगल की युति, शुम्र की राशि में स्थिति और लग्न त्रिकोण का संबंध प्रेम संबंधों का सूचक है। पंचम या सप्तक भाव में शुक्र सप्तमेश या पंचमेश के साथ हो।
2. किसी की जन्मपत्रिका में लग्न, पंचम, सप्तम भाव व इनके स्वामियों और शुक्र तथा चन्द्रमा जातक के वैवाहिक जीवन व प्रेम संबंधों को समान रूप से प्रभावित करते हैं। लग्र या लग्नेश का सप्तम और सप्तमेश का पंचम भाव व पंचमेश से किसी भी रूप में संबंध प्रेम संबंध की सूचना देता है। यह संबंध सफल होगा अथवा नही, इसकी सूचना ग्रह योगों की शुभ-अशुभ स्थिति देती है।
3. यदि सप्तकेश लग्नेश से कमजोर हो अथवा यदि सप्तमेश अस्त हो अथवा मित्र राशि में हो या नवांश में नीच राशि हो तो जातक का विवाह अपने से निम्र कुल में होता है। इसके विपरीत लग्नेश से सप्तवेश बाली हो, शुभ नवांश में ही तो जीवनसाथी उच्च कुल का होता है।
4. पंचमेश सप्तम भाव में हो अथवा लग्नेश और पंचमेश सप्तम भाव के स्वामी के साथ लग्न में स्थित हो। सप्तमेश पंचम भाव में हो और लग्न से संबंध बना रहा हो। पंचमेश सप्तम में हो और सप्तमेश पंचम में हो। सप्तमेश लग्न में और लग्नेश सप्तम में हो, साथ ही पंचम भाव के स्वामी से दृष्टि संबंध हो तो भी प्रेम संबंध का योग बनता है।
5. पंचम में मंगल भी प्रेम विवाह करवाता है। यदि राहु पंचम या सप्तम में हो तो प्रेम विवाह की संभावना होती है। सप्तम भाव में यदि मेष राशि में मंगल हो तो प्रेम विवाह होता है। सप्तमेश और पंचमेश एक-दूसरे के नक्षत्र पर हों तो भी प्रेम विवाह का योग बनता है।
6. पंचमेश तथा सप्तमेश कहीं भी, किसी भी तरह से द्वादशेष से संबंध बनाए लग्नेश या सप्तमेष का आपस में स्थान परिवर्तन अथवा आपस में युक्त होना अथवा दृष्टि संबंध।
7. जैमिनी सूत्रानुसार दाराकारक और पुत्रकारक की युति भी प्रेम विवाह कराती है। पंचमेश और दाराकार का संबंध भी प्रेम विवाह करवाता है।
8. सप्तमेश स्वग्रही हो, एकादश स्थान पापग्रहों के प्रभाव में बिलकुल न हो, शुक्र लग्न में लग्नेश के साथ, मंगल सप्तक भाव में हो, सप्तमेश के साथ, चन्द्रमा लग्न में लग्नेश के साथ हो, तो भी प्रेम विवाह का योग बनता है।

प्रेम विवाह असफल रहने के कारण

प्रेम विवाह असफल रहने के कारण
वर्तमान में आधुनिक परिवेश, खुला वातावरण, टीवी संस्कृति, वेलेन्टाइन डे जैसे अवसर के कारण हमारी युवा पीढ़ी अपने लक्ष्यों से भटक रही है। प्यार-मोहब्बत करें लेकिन सोच-समझकर। अवसाद, आत्महत्या या बदनामी से बचने हेतु प्रेम विवाह करने और दिल लगाने से पूर्व अपने साथी से अपने गुण-विचार ठीक प्रकार से मिला लें ताकि भविष्य में पछताना न पड़े।
ग्रहों के कारण व्यक्ति प्रेम करता है और इन्हीं ग्रहों के प्रभाव से दिल भी टूटते हैं। ज्योतिष शास्त्रों में प्रेम विवाह के योगों के बारे में स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता है, परन्तु प्रेम विवाह असफल रहने के कई कारण होते है :-
1. शुक्र व मंगल की स्थिति व प्रभाव प्रेम संबंधों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। यदि किसी जातक की कुण्डली में सभी अनुकूल स्थितियाँ होते हुई भी, शुक्र की स्थिति प्रतिकूल हो तो प्रेम संबंध टूटकर दिल टूटने की घटना होती है।
2. सप्तम भाव या सप्तमेश का पाप पीड़ित होना, पापयोग में होना प्रेम विवाह की सफलता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। पंचमेश व सप्तमेश दोनों की स्थिति इस प्रकार हो कि उनका सप्तम-पंचम से कोई संबंध न हो तो प्रेम की असफलता दृष्टिगत होती है।
3. शुक्र का सूर्य के नक्षत्र में होना और उस पर चन्द्रमा का प्रभाव होने की स्थिति में प्रेम संबंध होने के उपरांत या परिस्थितिवश विवाह हो जाने पर भी सफलता नहीं मिलती। शुक्र का सूर्य-चन्द्रमा के मध्य में होना असफल प्रेम का कारण है।
4. पंचम व सप्तम भाव के स्वामी ग्रह यदि धीमी गति के ग्रह हों तो प्रेम संबंधों का योग होने या चिरस्थायी प्रेम की अनुभूति को दर्शाता है। इस प्रकार के जातक जीवनभर प्रेम प्रसंगों को नहीं भूलते चाहे वे सफल हों या असफल।
प्रेम विवाह को मजबूत करने के उपाय :
1.
शुक्र देव की पूजा करें।
2. पंचमेश व सप्तमेश की पूजा करें।
3. पंचमेश का रत्न धारण करें ।
4. ब्ल्यू टोपाज सुखद दाम्पत्य एवं वशीकरण हेतु पहनें।
5. चन्द्रमणि प्रेम प्रसंग में सफलता प्रदान करती है।
प्रेम विवाह के लिए जन्मकुण्डली के पहले, पाँचवें सप्तम भाव के साथ-साथ बारहवें भाव को भी देखें क्योंकि विवाह के लिए बारहवाँ भाव भी देखा जाता है। यह भाव शय्या सुख का भी है। इन भावों के साथ-साथ उन (एक, पाँच, सात) भावों के स्वामियों की स्थिति का पता करना होता है। यदि इन भावों के स्वामियों का संबंध किसी भी रूप में अन्य भावों से बन रहा हो तो निश्चित रूप से जातक प्रेम विवाह करता है।
प्रेम विवाह को मजबूत करने के उपाय
अन्तरजातीय विवाह के मामले में शनि की मुख्य भूमिका होती है। यदि कुण्डली में शनि का संबंध किसी भी रूप से प्रेम विवाह कराने वाले भावेशों के भाव से हो तो जातक अन्तरजातीय विवाह करेगा। जीवनसाथी का संबंध सातवें भाव से होता है, जबकि पंचम भाव को सन्तान, विद्या एवं बुद्धि का भाव माना गया है, लेकिन यह भाव प्रेम को भी दर्शाता है। प्रेम विवाह के मामलों में यह भाव विशेष भूमिका दर्शाता है।
प्रेम एक दिव्य, अलौकिक एवं वंदनीय तथा प्रफुल्लता देने वाली स्थिति है। प्रेम मनुष्य में करुणा, दुलार, स्नेह की अनुभूति देता है। फिर चाहे वह भक्त का भगवान से हो, माता का पुत्र से या प्रेमी का प्रेमिका के लिए हो, सभी का अपना महत्व है। प्रेम और विवाह, विवाह और प्रेम दोनों के समान अर्थ है लेकिन दोनों के क्रम में परिवर्तन है। विवाह पश्चात पति या पत्नी के बीच समर्पण व भावनात्मकता प्रेम का एक पहलू है। प्रेम संबंध का विवाह में रूपांतरित होना इस बात को दर्शाता है कि प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे से भावनात्मक रूप से इतना जुड़े हुए हैं कि वे जीवनभर साथ रहना चाहते हैं।
सर्वविदित है कि हिन्दू संस्कृति में जिन सोलह संस्कारों का वर्णन किया गया है उनमें से विवाह एक महत्वपूर्ण संस्कार है। जीवन के विकास, उसमें सरलता और सृष्टि को नए आयाम देने के लिए विवाह परम आवश्यक प्रक्रिया है, इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता है।
प्रेम संवंध का परिणाम विवाह होगा या नहीं इस प्रकार की स्थिति में ज्योतिष का आश्रय लेकर काफी हद तक भविष्य के संभावित परिणामों के बारे में जाना जा सकता है। दिल लगाने से पूर्व या टूटने की स्थिति न आए, इस हेतु प्रेमी-प्रेमिका को अपनी जन्मपत्रिका के ग्रहों की स्थिति किसी योग्य ज्योतिषी से अवश्य पूछ लेनी चाहिए। प्रेम ईश्वर का वरदान है। प्रेम करें अवश्य लेकिन सोच-समझकर, कुंडली दिखाकर।

Sunday, April 26, 2009

व्यवसाय में सफलता का सटीक अध्ययन

शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात अक्सर युवाओं के मन में यह दुविधा रहती है कि नौकरी या व्यवसाय में से उनके लिए उचित क्या होगा। इस संबंध में जन्मकुंडली का सटीक अध्ययन सही दिशा चुनने में सहायक हो सकता है।
* नौकरी या व्यवसाय देखने के लिए सर्वप्रथम कुंडली में दशम, लग्न और सप्तम स्थान के अधिपति तथा उन भावों में स्थित ग्रहों को देखा जाता है।
* लग्न या सप्तम स्थान बलवान होने पर स्वतंत्र व्यवसाय में सफलता का योग बनता है।
* प्रायः लग्न राशि, चंद्र राशि और दशम भाव में स्थित ग्रहों के बल के तुलनात्मक अध्ययन द्वारा व्यवसाय का निर्धारण करना उचित रहता है।
* प्रायः अग्नि तत्व वाली राशि (मेष, सिंह, धनु) के जातकों को बुद्धि और मानसिक कौशल संबंधी व्यवसाय जैसे कोचिंग कक्षाएँ, कन्सल्टेंसी, लेखन, ज्योतिष आदि में सफलता मिलती है।
* पृथ्वी तत्व वाली राशि (वृष, कन्या, मकर) के जातकों को शारीरिक क्षमता वाले व्यवसाय जैसे कृषि, भवन निर्माण, राजनीति आदि में सफलता मिलती है।
जल तत्व वाली राशि (कर्क, वृश्चिक, मीन) के जातक प्रायः व्यवसाय बदलते रहते हैं। इन्हें द्रव, स्प्रिट, तेल, जहाज से भ्रमण, दुग्ध व्यवसाय आदि में सफलता मिल सकती है।
* वायु तत्व (मिथुन, तुला, कुंभ) प्रधान व्यक्ति साहित्य, परामर्शदाता, कलाविद, प्रकाशन, लेखन, रिपोर्टर, मार्केटिंग आदि के कामों में अपना हुनर दिखा सकते हैं।
* दशम स्थान में सूर्य हो : पैतृक व्यवसाय (औषधि, ठेकेदारी, सोने का व्यवसाय, वस्त्रों का क्रय-विक्रय आदि) से उन्नति होती है। ये जातक प्रायः सरकारी नौकरी में अच्छे पद पर जाते हैं।
* चन्द्र होने पर : जातक मातृ कुल का व्यवसाय या माता के धन से (आभूषण, मोती, खेती, वस्त्र आदि) व्यवसाय करता है।
* मंगल होने पर : भाइयों के साथ पार्टनरशिप (बिजली के उपकरण, अस्त्र-शस्त्र, आतिशबाजी, वकालत, फौजदारी) में व्यवसाय लाभ देता है। ये व्यक्ति सेना, पुलिस में भी सफल होते हैं।
* बुध होने पर : मित्रों के साथ व्यवसाय लाभ देता है। लेखक, कवि, ज्योतिषी, पुरोहित, चित्रकला, भाषणकला संबंधी कार्य में लाभ होता है।
* बृहस्पति होने पर : भाई-बहनों के साथ व्यवसाय में लाभ, इतिहासकार, प्रोफेसर, धर्मोपदेशक, जज, व्याख्यानकर्ता आदि कार्यों में लाभ होता है।
* शुक्र होने पर : पत्नी से धन लाभ, व्यवसाय में सहयोग। जौहरी का कार्य, भोजन, होटल संबंधी कार्य, आभूषण, पुष्प विक्रय आदि कामों में लाभ होता है।
शनि :- शनि अगर दसवें भाव में स्वग्रही यानी अपनी ही राशि का हो तो 36वें साल के बाद फायदा होता है। ऐसे जातक अधिकांश नौकरी ही करते हैं। अधिकतर सिविल या मैकेनिकल इंजीनियरिंग में जाते है। लेकिन अगर दूसरी राशि या शत्रु राशि का हो तो बेहद तकलीफों के बाद सफलता मिलती है। अधिकांश मामलों में कम स्तर के मशीनरी कामकाज से व्यक्ति जुदा हो जाता है।
राहू :- अचानक लॉटरी से, सट्‍टे से या शेयर से व्यक्ति को लाभ मिलता है। ऐसे जातक राजनीति में विशेष रूप सफल रहते हैं।
केतु :- केतु की दशम में स्थिति संदिग्ध मानी जाती है किंतु अगर साथ में अच्छे ग्रह हो तो उसी ग्रह के अनुसार फल मिलता है लेकिन अकेला होने या पाप प्रभाव में होने पर के‍तु व्यक्ति को करियर के क्षेत्र में डूबो देता है।
चतुर्थ स्थान से जानें आशियाने का सुख
अपना घर बनाना और उसमें सुख से रहना हर व्यक्ति का सपना होता है, मगर कई बार अथक प्रयत्नों के बावजूद या तो घर ही नहीं बन पाता, यदि बन जाए तो उसमें रहने पर सुख-शांति नहीं मिलती। आपके भाग्य में घर का सुख है या नहीं, इस बारे में कुंडली से स्पष्ट संकेत मिल सकते हैं।

घर का सुख देखने के लिए मुख्यत: चतुर्थ स्थान को देखा जाता है। फिर गुरु, शुक्र और चंद्र के बलाबल का विचार प्रमुखता से किया जाता है। जब-जब मूल राशि स्वामी या चंद्रमा से गुरु, शुक्र या चतुर्थ स्थान के स्वामी का शुभ योग होता है, तब घर खरीदने, नवनिर्माण या मूल्यवान घरेलू वस्तुएँ खरीदने का योग बनता है।

गृह-सौख्य संबंधी मुख्य सिद्धांत
1. चतुर्थ स्थान में शुभ ग्रह हों तो घर का सुख उत्तम रहता है।
2. चंद्रमा से चतुर्थ में शुभ ग्रह होने पर घर संबंधी शुभ फल मिलते हैं।
3. चतुर्थ स्थान पर गुरु-शुक्र की दृष्टि उच्च कोटि का गृह सुख देती है।
4. चतुर्थ स्थान का स्वामी 6, 8, 12 स्थान में हो तो गृह निर्माण में बाधाएँ आती हैं। उसी तरह 6, 8, 12 भावों में स्वामी चतुर्थ स्थान में हो तो गृह सुख बाधित हो जाता है।
5. चतुर्थ स्थान का मंगल घर में आग से दुर्घटना का संकेत देता है। अशांति रहती है।
6. चतुर्थ में शनि हो, शनि की राशि हो या दृष्टि हो तो घर में सीलन, बीमारी व अशांति रहती है।
7. चतुर्थ स्थान का केतु घर में उदासीनता ‍देता है।
8. चतुर्थ स्थान का राहु मानसिक अशांति, पीड़ा, चोरी आदि का डर देता है।
9. चतुर्थ स्थान का अधिपति यदि नैप्च्यून से अशुभ योग करे तो घर खरीदते समय या बेचते समय धोखा होने के संकेत मिलते हैं।
10. चतुर्थ स्थान में यूरेनस का पापग्रहों से योग घर में दुर्घटना, विस्फोट आदि के योग बनाता है।
11 चतुर्थ स्थान का अधिपति 1, 4, 9 या 10 में होने पर गृह-सौख्य उच्च कोटि का मिलता है।

उपरोक्त संकेतों के आधार पर कुंडली का विवेचन कर घर खरीदने या निर्माण करने की शुरुआत की जाए तो लाभ हो सकता है। इसी तरह पति, पत्नी या घर के जिस सदस्य की कुंडली में गृह-सौख्य के शुभ योग हों, उसके नाम से घर खरीदकर भी कई परेशानियों से बचा जा सकता है।

Wednesday, April 22, 2009

जन्मपत्रिकामेंशिक्षाकेयोग आज जीवन के हर मोड़ पर आम आदमी स्वयं को खोया हुआ महसूस करता है। विशेष रूप से वह विद्यार्थी जिसने हाल ही में दसवीं या बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की है, उसके सामने सबसे बड़ा संकट यह रहता है कि वह कौन से विषय का चयन करे जो उसके लिए लाभदायक हो। एक अनुभवी ज्योतिषी आपकी अच्छी मदद कर सकता है। जन्मपत्रिका में पंचम भाव से शिक्षा तथा नवम भाव से उच्च शिक्षा तथा भाग्य के बारे में विचार किया जाता है। सबसे पहले जातक की कुंडली में पंचम भाव तथा उसका स्वामी कौन है तथा पंचम भाव पर किन-किन ग्रहों की दृष्टि है, ये ग्रह शुभ-अशुभ है अथवा मित्र-शत्रु, अधिमित्र हैं विचार करना चाहिए। दूसरी बात नवम भाव एवं उसका स्वामी, नवम भाव स्थित ग्रह, नवम भाव पर ग्रह दृष्टि आदि शुभाशुभ का जानना। तीसरी बात जातक का सुदर्शन चंद्र स्थित श्रेष्ठ लग्न के दशम भाव का स्वामी नवांश कुंडली में किस राशि में किन परिस्थितियों में स्थित है ज्ञात करना, तीसरी स्थिति से जातक की आय एवं आय के स्त्रोत का ज्ञान होगा। जन्मकुंडली में जो सर्वाधिक प्रभावी ग्रह होता है सामान्यत: व्यक्ति उसी ग्रह से संबंधित कार्य-व्यवसाय करता है। यदि हमें कार्य व्यवसाय के बारे में जानकारी मिल जाती है तो शिक्षा भी उसी से संबंधित होगी। जैसे यदि जन्म कुंडली में गुरु सर्वाधिक प्रभावी है तो जातक को चिकित्सा, लेखन, शिक्षा, खाद्य पदार्थ के द्वारा आय होगी। यदि जातक को चिकित्सक योग है तो जातक जीव विज्ञान विषय लेकर चिकित्सक बनेगा। यदि पत्रिका में गुरु कमजोर है तो जातक आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक, रैकी या इनके समकक्ष ज्ञान प्राप्त करेगा। श्रेष्ठ गुरु होने पर एमबीबीएस की पढ़ाई करेगा। यदि गुरु के साथ मंगल का श्रेष्ठ योग बन रहा है तो शल्य चिकित्सक, यदि सूर्य से योग बन रहा है तो नेत्र चिकित्सा या सोनोग्राफी या इलेक्ट्रॉनिक उपकरण से संबंधित विषय की शिक्षा, यदि शुक्र है तो महिला रोग विशेषज्ञ, बुध है तो मनोरोग तथा राहु है तो हड्डी रोग विशेषज्ञ बनेगा। चंद्र की श्रेष्ठ स्थिति में किसी विषय पर गहन अध्ययन करेगा। लेखक, कवि, श्रेष्ठ विचारक बनेगा तथा बीए, एमए कर श्रेष्ठ चिंतनशील, योजनाकार होगा। सूर्य के प्रबल होने पर इलेक्ट्रॉनिक से संबंधित शिक्षा ग्रहण करेगा। यदि मंगल अनुकूल है तो ऐसा जातक कला, भूमि, भवन, निर्माण, खदान, केमिकल आदि से संबंधित विषय शिक्षा ग्रहण करेगा। बुध प्रधान कुंडली वाले जातक बैंक, बीमा, कमीशन, वित्तीय संस्थान, वाणी से संबंधित कार्य, ज्योतिष-वैद्य, शिक्षक, वकील, सलाहकार, चार्टड अकाउंटेंट, इंजीनियर, लेखपाल आदि का कार्य करते हैं। अत: ऐसे जातक को साइंस, मैथ्स की शिक्षा ग्रहण करना चाहिए किंतु यदि बुध कमजोर हो तो वाणिज्य विषय लेना चाहिए। बुध की श्रेष्ठ स्थिति में चार्टड अकाउंटेंट की शिक्षा ग्रहण करना चाहिए। शुक्र की अनुकूलता से जातक साइंस की शिक्षा ग्रहण करेगा। शुक्र की अधिक अनुकूलता होने से जातक फैशन, सुगंधित व्यवसाय, श्रेष्ठ कलाकार तथा रत्नों से संबंधित विषय को चुनता है। शनि ग्रह प्रबंध, लौह तत्व, तेल, मशीनरी आदि विषय का कारक है। अत: ऐसे जातकों की शिक्षा में व्यवधान के साथ पूर्ण होती है। शनि के साथ बुध होने पर जातक एमबीए फाइनेंस में करेगा। यदि शनि के साथ मंगल भी कारक है तो सेना-पुलिस अथवा शौर्य से संबंधित विभाग में अधिकारी बनेगा। राहु की प्रधानता कुटिल ज्ञान को दर्शाती है। केतु - तेजी मंदी तथा अचानक आय देने वाले कार्य शेयर, तेजी मंदी के बाजार, सट्टा, प्रतियोगी क्वीज, लॉटरी आदि। कभी-कभी एक ही ग्रह विभिन्न विषयों के सूचक होते हैं तो ऐसी स्थिति में जातक एवं ज्योतिषी दोनों ही अनिर्णय की स्थिति में आ जाते हैं। उसका सही अनुमान लगाना ज्योतिषी का कार्य है। ऐसी स्थिति में देश, काल एवं पात्र को देखकर निर्णय लेना उचित रहेगा। जैसे नवांश में बुध का स्वराशि होना ज्योतिष, वैद्य, वकील, सलाहकार का सूचक है। अब यहां जातक के पिता का व्यवसाय (स्वयं की रुचि) जिस विषय की होगी, वह उसी विषय का अध्ययन कर धनार्जन करेगा।











































Monday, April 20, 2009

ग्रह निर्धारित करते हैं आपका व्यक्तित्व (भाग 3)
पिछले दो लेखों भाग 1 और भाग 2 के माध्यम से आपने यह जाना कि मानव मस्तिष्क जो कि ज्योतिष अनुसार 42 विभिन्न केन्द्रों मे विभाजित है, जिन के द्वारा मनुष्य के अन्दर विभिन्न प्रकार के गुण-दोषों का विकास होता है। अब इस पोस्ट के जरिए ये समझने की चेष्टा करते हैं कि जन्मकुंडली में किस प्रकार विभिन्न ग्रह अपनी स्थिति के द्वारा इन केन्द्रों को स्पंदित करके, मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्धारण करते हैं ।
1. अगर सप्तमेश स्वगृ्ही होकर सप्तम स्थान में ही बैठा हो अथवा तीसरे भाव का स्वामी इस स्थान में स्थित हो तो वह मन में तीव्र अभिलाषाओं की उत्पत्ति का कारण बनता है। ऎसे व्यक्ति के मन मस्तिष्क में असीम ईच्छाएं निरन्तर जन्म लेती रहती हैं। अनुभव सिद्ध है कि चपटे सिर वाले जातक की अभिलाषाएं अधिक होती हैं और तंग सिर वाले की कम।
2.यदि कुंडली में पांचवें भाव का स्वामी अष्टम स्थान में स्थित हो तो वह मस्तिष्क के अष्ट्म भाग को स्पंदित करते हुए प्रभावित करता है। जिससे जातक के अन्दर दृ्ड निश्चयी प्रवृ्ति का प्रादुर्भाव होता है। ऎसे व्यक्तियों में भीषण से भीषण मुसीबत से लडकर सुरक्षित निकल जाने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है।
3.दशमेश अगर नवम भाव में स्थित हो तो जातक के अन्दर प्रतिशोध प्रवृ्ति का प्रादुर्भाव होता है। ऎसे व्यक्तियों के मन में बदला लेने की भावना प्रबल हो जाती है। यदि जातक अपने जीते जी अनिष्टकर्ता से बदला नहीं ले पाता तो वह अपनी संतान से कह जाता है कि पिता के शत्रु से बदला अवश्य ले।
4.तृ्तीयेश अगर स्वगृ्ही होकर तीसरे भाव में ही स्थित हो तो वह मस्तिष्क के दशम भाग को स्पंदित करके स्वाद इन्द्रियों को जागृ्त करता है। ऎसे व्यक्तियों में अनुभव करने की तीव्र शक्ति तथा उसकी पाचन शक्ति काफी प्रबल होती है।
5.अगर दशमेश स्वगृ्ही दशम भाव में बैठा हो तो जातक में दूरदर्शिता की प्रवृ्ति उत्पन्न होती है। ऎसा व्यक्ति भविष्य का हित सोचकर समय से पूर्व ही कार्य सम्पन्न कर लेता है, वह भाग्य के भरोसे नहीं बैठा रह सकता।
6. यदि द्वादशेश अर्थात बाहरवें भाव का स्वामी कुंडली के छठे भाव में स्थित हो तो वह मस्तिष्क के 18वें,23वें तथा 30वें भाग को स्पंदित करता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति के अन्दर आशा-विश्वास, सौन्दर्य प्रेम, एवं संतुलन रखने की शक्ति का प्रादुर्भाव होता है।18वें केन्द्र के कारण उसमें आशा विश्वास की प्रबलता,23वें केन्द्र के कारण सौन्दर्य प्रेम की प्रवृ्ति उत्पन्न होती है। ऎसे व्यक्ति की दृ्ष्टि में अपना रूप रंग,पोशाक,पत्नि सब कुछ सुन्दर होना चाहिए, गुण हों चाहे न हों, केवल सुन्दरता होनी चाहिए। तथा 30वें केन्द्र से संतुलन शक्ति के कारण 'यथा देव तथा पूजा' जैसी प्रवृ्ति अर्थात उसमें तालमेल बिठाने की शक्ति गजब की होती है।
7.चतुर्थेश अगर स्वगृ्ही है तो वो मस्तिष्क के 4थे(मैत्री भाग),21वें(दया-सहानुभूति भाग) 28वें(स्मृ्ति भाग)तथा 40वें(तुलनात्मक शक्ति) के केन्द्रों को संचालित करता है। फलस्वरूप व्यक्ति अपने मित्रों के दोषों को छुपाने तथा गुणों को उजागर करने में कुशल होता है।यदि उसकी पेशानी ज्यादा चौडी एवं कम ऊंची हो तो सहानुभूति मध्यम श्रेणी की ,अगर पेशानी तंग हो तो सहानुभूति थोडी कम होती है, किन्तु होती अवश्य है। ऎसे व्यक्तियों में पुरानी स्मृ्तियों को संजोकर रखने की क्षमता बहुत ज्यादा होती है,साथ ही ऎसा व्यक्ति तुलनात्मक अध्य्यन द्वारा तथ्यों को समझने में भी पूर्ण रूप से निपुण होता है।
8.दशमेश यदि अष्ट्म भाव में हो तो व्यक्ति जातक में कपटाचरण की प्रबृ्ति बहुत बढ जाती है। जातक प्रत्येक वस्तु को साफ-सुथरी और व्यवस्थित रूप से रखने में चिश्वास रखता है, किन्तु वास्तव में वह भेड की खाल में भेडिया ही होता है।
9.दशमेश यदि तीसरे भाव में हो तो वह मस्तिष्क के 12वें तथा 36वें केन्द्र को सपंदित करता है। जिससे जातक में गोपनीयता तथा कालगति का की प्रवृ्ति उत्पन्न होती है। वह प्रत्येक कार्य चालाकी से करना,अपना भेद छुपाए रखना तथा जब तक अपने विचारों को प्रकट करने का उचित्त अवसर न आए,तब तक छुपाए रखता है।
10. पंचमेश के स्वगृ्ही होने से मस्तिष्क के 20वें(बडप्पन),29वें(व्यवहारिकता एवं तदबीर),तथा 41वें केन्द्र(मानवीय गुण) स्पंदित होते हैं। ऎसा व्यक्ति अपनी जाति/कुल/परम्परा/स्थान/देश इत्यादि के प्रति बडप्पन की भावना लेकर जीता है। उसे 24 से 29 वर्ष की आयु मध्य अपने जीवनकाल में चिडियों के हाथों बाज को मरवा देने वाली तदबीर का कमाल देखने को मिलता है।चाहे ऎसा व्यक्ति चाहे ऊपर से कितना भी कठोर दिखाई दे, किन्तु उसके हृ्दय में मानवीय गुणों का निरन्तर प्रवाह बना रहता है।
11. भाग्येश (नवम भाव का स्वामी) एकादश भाव में स्थित होकर मस्तिष्क के 35वें केन्द्र को स्पंदित करता है। जिस कारण जातक में घटनाओं में रूचि लेने की प्रवृ्ति जागृ्त होती है।अक्सर देखा गया है कि इतिहास अथवा राजनीति ऎसे व्यक्तियों का प्रिय विषय होता है।
इतना सब पढने के बाद बहुत से पाठकों के मन मे यही प्रश्न होगा कि हमें तो ये मालूम ही नहीं है कि हमारी जन्मकुंड्ली में कौन सा ग्रह मस्तिष्क के किस केन्द्र को प्रभावित कर रहा हैं,ये सारी जानकारी तो केवल ज्योतिष के जानकार लोगों के लिए हैं।
अतैव जिन पाठकों को ज्योतिष विधा की सामान्य जानकारी भी नहीं हैं, किन्तु मन में इस विषय को समझने अथवा अपने बारे में जानने की जिज्ञासा रखते हैं, वो लोग अपना जन्मविवरण टिप्पणी अथवा मेल के जरिए भेजकर अपनी ग्रह स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। उसके पश्चात आप स्वयं अनुभव करेंगे कि यहां इन लेखों के माध्यम से आपके सामने जो सामग्री प्रस्तुत की जा रही है, वो कोई कपोल कल्पित बातें अथवा केवल किताबी ज्ञान नहीं अपितु पूर्णत: अनुभव सिद्ध हैं।