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कैसा होगा आपका जीवनसाथी युवावस्था में आते ही भावी पति या पत्नी के बारे में जानने की इच्छा प्रबल होती जाती है। कुंडली का सप्तम भाव भावी पति या प‍त्नी के बारे में स्पष्ट सूचना देता है। 1. सप्तम स्थान में जो राशि होती है, उसके स्वभावनुसार भावी जीवनसाथी का व्यक्तित्व होता है। यदि अग्नि तत्व की राशि हो (मेष, सिंह, धनु) तो साहसी, निर्भीक, गुस्से वाला साथी मिलता है। जल तत्व की राशि हो (कर्क, वृश्चिक, मीन) तो भावुक, कोमल स्वभाव का साथी होता है। पृथ्वी तत्व की राशि हो (वृष, कन्या, मकर) तो कार्यकुशल मगर अंतर्मुखी होते हैं। वायु तत्व की राशि हो (मिथुन, तुला, कुंभ) तो व्यवहार कुशल, वाचाल, सामाजिक होते हैं। 2. सप्तम भाव में जो ग्रह हो, उसके अनुसार भी भावी साथी के स्वभाव का अंदाज लगाया जा सकता है। सूर्य : अहंकारी, आत्मविश्वासी, ऊँचे खानदान वाला, हुकुमत व अधिकार जताने वाला। मंगल : महत्वाकांक्षी, गुस्सैल, उत्साही, खर्चीला, खाने-पीने का शौकीन। बुध : व्यवहार कुशल, बातूनी, बुद्धिमान, पढ़ाकू गुरु : सुशिक्षित, धार्मिक, नम्र, समझदार शुक्र : कलाप्रिय, अच्‍छी अभिरुचि वाला, रूपवान, गृहस्थी में रस लेने वाल...
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   आपका नन्हा शिशु और ज्योतिष संसार की सबसे महत्वपूर्ण घटना जो हमारे जीवन में धटती हैं, वह है हमारे परिवार में बालक का जन्म। हिन्दू संस्कृति में विशेषकर संतान वह भी पुत्र संतान का जन्म विशेष महत्व का माना जाता है। यह कहा जाता है कि पितृ ऋण से मुक्ति प्राप्त करने के लिये पुत्र संतान का जन्म होना ही चाहिये। आज मान्यतायें तेजी से बदल रही हैं। आज बहुत से परिवार हैं जो लड़के और लड़की के जन्म में कोई भेद नहीं मानते हैं। उनका मानना है कि संतान का योग्य होना, स्वस्थ रहना ज्यादा महत्वपूर्ण है। आज यह वास्तविकता है कि लड़कियां किसी भी क्षेत्र में अपनी योग्यता साबित करने में लड़कों से पीछे नहीं हैं। संतान के चरण का निर्धारण संतान के जन्म के समय पूछे जाने वाले प्रश्न साधारणतया निम्नलिखित होते हैं - कि उसके चरण कौन से हैं - चांदी, तांबा, स्वर्ण या फिर लौह के। इसके ग्रह माता-पिता, दादी-दादा या नाना-नानी के लिये कैसे हैं, ये मंगली है या नहीं। इसकी आयु कितनी है। विद्या-बुद्धि कैसी रहेगी या स्वास्थ्य ठीक रहेगा या नहीं। मूलों का जन्म है या नहीं। बालक के चरण कैसे ...
संसार में ज्योतिष की कई शाखाऎं हैं, जिनमें से अंक ज्योतिष भी एक है. सामान्यतय ज्योतिष में ग्रहो का प्रभाव कार्य करता है. प्रत्येक ग्रह किसी न किसी नम्बर से जुडा हुआ है या हुम इस प्रकार भी कह सकते हैं कि कोइ एक नम्बर किसी ग्रह विशेष का प्रतिनिधित्व करता है, जैसे कि 1 नम्बर सूर्य 2 नम्बर चन्द्र तथा 9 नम्बर मंगल या इत्यादि. नम्बर 1 से 9 तक ही लिए जाते हैं. 0 को इसमें सम्मिलित नही किया गया है. ग्रह भी 9 ही होते हैं, अतः प्रत्येक ग्रह का एक विशेष अंक है. पाश्चात्य अंक ज्योतिष सात ग्रहो के अलावा नैपच्यून व यूरेनस को क्रमशः आठवाँ व नौवा ग्रह मानता है. जबकि भारतीय अंक ज्योतिष राहु-केतु को आठवें एंव नवें ग्रह के रुप में लेता है. भारतीय एंव पाश्चात्य अंक ज्योतिष के फलादेश कथन में थोडा सा अन्तर रहता है. अब हम अंक ज्योतिष विज्ञान के कार्य करने के तरीके की विवेचना करेंगे. वैसे तो अंक ज्योतिष में बहुत सारी परिभाषाएँ सामने आती हैं, परन्तु हम इसमें मुख्य रुप से दो परिभाषाओ मूलांक तथा भाग्यांक की ही चर्चा करेंगे. किसी भी व्यक्ति की जन्म तारीख उसका मूल्यांक होता है. जैसे कि 2 जुलाई को जन्मे...
ज्योतिष: अद्वैत का विज्ञान भगवान श्री के चरणों में निवेदन करूंगा कि हम एक नये विषय पर भगवान श्री से मार्ग-दर्शन चाहेंगे और वह विषय है ज्योतिष। यह अछूता विषय है, भगवान श्री के श्रीमुख से इस पर कभी चर्चा नहीं हुई है। तो भगवान श्री के श्रीचरणों में पुनः निवेदन करूंगा कि आज ज्योतिष के संबंध में हमारा मार्ग-दर्शन करें। जोतिष शायद सबसे पुराना विषय है और एक अर्थ में सबसे ज्यादा तिरस्कृत विषय भी है। सबसे पुराना इसलिए कि मनुष्य-जाति के इतिहास की जितनी खोजबीन हो सकी है उसमें ज्योतिष, ऐसा कोई भी समय नहीं था, जब मौजूद न रहा हो। जीसस से पच्चीस हजार वर्ष पूर्व सुमेर में मिले हुए हड्डी के अवशेषों पर ज्योतिष के चिह्न अंकित हैं। पश्चिम में पुरानी से पुरानी जो खोजबीन हुई है, वह जीसस से पच्चीस हजार वर्ष पूर्व इन हड्डियों की है, जिन पर ज्योतिष के चिह्न और चंद्र की यात्रा के चिह्न अंकित हैं। लेकिन भारत में तो बात और भी पुरानी है। ऋग्वेद में, पंचानबे हजार वर्ष पूर्व ग्रह-नक्षत्रों की जैसी स्थिति थी, उसका उल्लेख है। इसी आधार पर लोकमान्य तिलक ने यह तय किया था कि ज्योतिष नब्बे हजार वर्ष से ज्यादा प...
पाराशरीय धनदायक योग ज्योतिषशास्त्र के पितामह महर्षि पाराशर ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ "वृहत पाराशर" में जिस धन मान और सुख देने वाले राजयोग का उपदेश दिया है,उस योग का ज्योतिष संसार में सार्वभौम आदर ही उस योग की महत्ता और गौरव का एक प्रयाप्त प्रमाण है.महर्षि पाराशर का आदेश है,कि जैसे भगवान विष्णु के अवतरण समय पर उनकी शक्ति लक्ष्मी उनसे मिलती है,तो संसार में उपकार की सृष्टि होती है.इसी प्रकार जब केंद्र घरों के स्वामियों का योग त्रिकोण घरों के स्वामियों से होता है,अथवा जब एक ही ग्रह जब केंद्र और त्रिकोण का दोनों का स्वामी हो जाता है,तो इस योग अथवा संबन्ध के फ़लस्वरूप उच्च पदवी,मान,यश तथा विशेष धन की प्राप्ति होती है.यदि यह केन्द्र और त्रिकोण का स्वामी जिसको ज्योतिष की परिभाषा में राजयोग कारक ग्रह कहते हैं,तनिक भी बलवान हो तो अपनी दशा और विशेषतया अपनी अन्तर्दशा में निश्चित रूप से धन पदवी तथा मान में वृद्धि करता है.यह बात अनुभव में भी है और पत्थर की लकीर भी है.
अतुलित बलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।। अकस्मात् धन प्राप्ति योग (क) यदि द्वितीयेश और चतुर्थेश शुभ ग्रह (बुध-शुक्र) की राशि में शुभग्रहों से युत या दृष्ट हो। (ख) पंचम भाव में चन्द्रमा पर शुक्र की पूर्ण दृष्टि हो। (ग) 1, 2, 11 वें भाव के स्वामियों में लग्न का स्वामी दूसरे घर में, दूसरे का स्वामी ग्यारहवें में तथा ग्यारहवें का स्वामी लग्न में हो। (घ) एकादशेश और द्वितीयेश चतुर्थस्थ होंऔर चतुर्थेश शुभग्रह की राशि में शुभयुत या दृष्ट। (ङ) धनेश अष्टम भाव में हो। (च) लग्न का स्वामी धनस्थान में हो, लाभ-स्थान में हो और लाभेश लग्न में हो। (जातक पारिजात) (छ) लग्नेश शुभग्रह हो और धन स्थान में स्थित हो या धनेश आठवें स्थान में हो। (ज) यदि पंचम स्थान में शुक्र से दृष्ट चन्द्रमा हो। (झ) यदि धन भाव का स्वामी शनि (धनु, मकर लग्न) 4, 8 या 12वें भाव में हो तथा बुध सप्तम भाव में स्वगृही होकर बैठा हो। अकस्मात् धन नाश (क) दूसरे भाव में कर्क का चन्द्रमा शनि के नक्षत्र पर स्थित हो और अष्टम भाव में स्वगृही शनि चन्द्र के नक्षत्र पर स्...